देश की बैंकिंग प्रणाली में एक चौथाई से अधिक कामकाज करने वाली स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की साख गिराने में वित्त मंत्रालय का दोष कुछ कम नहीं है।
सरकार के पास इस बैंक के 59.5 प्रतिशत अंश हैं, इसलिए बैंक के 23 हजार करोड़ रु.के राइट इश्यू के लिए खजाने से भारी भरकम रकम निकालनी पड़ सकती थी। इसलिए जो इश्यू एक वर्ष पूर्व जारी हो जाना था वह अब एक वर्ष बाद अर्थात 31 मार्च 2012 तक भी जारी होता है या नहीं, इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सरकार के खजाने की स्थिति बहुत पतली है।
सरकार के साथ ही बैंक के नए चेयरमैन भी कुछ हद तक कसूरवार सिद्ध किए जा सकते हैं, क्योंकि चालू वित्तीय वर्ष की प्रथम तिमाही में एक साथ भारी-भरकम प्रावधान करके बैंक का लाभ काफी घटा दिया था। ऐसा ही उन्होंने गत तिमाही में किया, जिससे बैंक का चौथी तिमाही का लाभ भी बेमायने हो गया है। बैंक के पूर्व चेयरमैन भी दोषी हैं ही, क्योंकि 2008 की मंदी के बाद बैंक की स्थिति को नहीं सम्हाल सके और एनपीए को कुल कर्जों का 70 प्रतिशत तक बढ़ा दिया था, अगर बैंक की घटी हुई टायर एक पूँजी के अनुपात में देखा जाए तो एनपीए अभी भी 42-43 प्रतिशत के करीब है।
उपरोक्त मिलेजुले कारणों से एक वर्ष पूर्व बैंक के शेयरों के ऊँचे भाव अब तक 40 प्रतिशत घट चुके हैं। इसलिए बहुत ही गलत समय पर साख दर घटाई गई है। साख दर व पिछली तिमाही के परिणामों ने शेयर के भावों को गर्दिश में ला दिया। अब प्रश्न यह है कि राइट इश्यू से निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप पूंजी कैसे जुटाई जाएगी?
वैसे बैंक के लिए फॉलोआन इश्यू एवं संस्थागत प्लेसमेंट की संभावनाएँ खुली हैं, किंतु ये सुविधाएँ आज की स्थिति में अधिक लाभप्रद नहीं हैं, क्योंकि इससे बैंक में सरकारी हिस्सेदारी घटेगी। इसलिए एकमात्र चारा राइट इश्यू का ही है। बैंक ने साख दर न घटे, इसलिए पिछले वर्ष परफेक्चुअल डेट के तहत दो किस्तों में 62.50 करोड़ डॉलर के कर्ज उधार जुटा लिए थे। तब ये उधार टायर एक पूँजी में शुमार होते थे, किंतु बाद में बैसेल तृतीय के निर्णय के अनुसार ये उधार बुनियादी (टायर एक) केपिटल में शुमार नहीं करने की घोषणा कर दी। इस वजह से जुटाए गए उधार बेमायने हो गए। इसी वजह से बैंक की टायर एक पूँजी घटकर 7.6 प्रतिशत रह गई, जबकि 8 प्रतिशत रहना चाहिए।
अब जब राइट इश्यू के तहत बैंक को 23 हजार अथवा 20 हजार करोड़ रु. मिल जाएँगे तो बुनियादी पूँजी पुनः बढ़कर 8 प्रतिशत हो जाएगी और साख दर पुनः सुधर जाएगी।
साख दर मूडिज इंवेस्टमेंट सर्विस ने सी-से घटाकर डी+ की है अर्थात महज एक बिंदु घटाई है, जबकि इटली की एक साथ तीन बिंदु घटाई है। साख दर घटने से विश्व पूँजी बाजार से अल्प अवधि के कर्ज जुटाना महँगा हो जाता है। थोड़ा फर्क बैंक के शेयरों में निवेश पर भी पड़ता है, क्योंकि निवेशक एक ओर बैंक के आकार व पोर्टफोलियो की जोखिम का भी अंदाज लगाते हैं, किंतु अच्छी बात यह है बैंक अंदरुनी रूप से अभी भी मजबूत एवं पुख्ता है। वहीं आज बैंक को न अल्प अवधि के संसाधन जुटाना हैं और न लंबी अवधि के। इसलिए उसे साख दर घटने से अधिक हानि होने या लागत बढ़ने की संभावना नहीं जैसी है। आज के हालात में जो स्थिति देश की अन्य बैंकों की है, वैसी ही एसबीआई की रह सकती है। देश की अर्थव्यवस्था रूँधने से जो असर अन्य बैंकों पर पड़ने वाला है उससे एसबीआई को भी जूझना पड़ेगा। महँगाई, बढ़ते औद्योगिक कच्चे माल के भाव, बढ़ती ब्याज दर व घटती आर्थिक वृद्धि की दर के असर से बच पाना मुश्किल है, क्योंकि इन कारणों से उद्योगों में कर्ज की माँग घट सकती है।
सरकार द्वारा अतिरिक्त रूप से 50 हजार करोड़ रु. के कर्ज जुटाने से देश के सरकारी बॉण्ड्स बाजार में यील्ड रेट (प्राप्ति दर) काफी बढ़ गई है अर्थात सरकारी बॉण्डों के मूल्य घट गए हैं। इस वजह से देश की बैंकों द्वारा खरीदे गए सरकारी बॉण्डों के मूल्य घटाकर बाजार आधारित करना पड़ेगा एवं जितने मूल्य घटे हैं, उसके लिए प्रावधान कर उसे लाभ में से घटाना पड़ेगा। इससे उनका लाभ घटेगा।
अंतरराष्ट्रीय साख एजेंसी मूडिज की भी चिंता यही है कि एक ओर बैंक की पूँजी घटी हुई है एवं दूसरी ओर उसे चिंता यह भी है कि बैंक की संपत्ति की गुणवत्ता घटी है एनपीए की अधिकता की वजह से। तीसरी ओर आर्थिक वृद्धि दर घटने एवं बैंक कर्ज महँगे होने से टेक्सटाइल, इस्पात, पावर, रियल इस्टेट आदि क्षेत्र के नए कर्जे की वसूली भी उलझ सकती है, जिससे कर्जों के पुनर्गठन का सिलसिला पुनः शुरू हो सकता है। वैसे यह समस्या दुनिया की सभी बैंकों की है और इससे सम्हलकर ही निपटना पड़ेगा।






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